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माँ का दिल – भाग 6

धनावह सेठ ने कहा : ‘मैंने भी उस रास्ते के मेरे परिचित व्यापारी श्रेष्ठियों को समाचार भिजवा दिये हैं ।’ ‘प्रयाण कब करने का है ?’ महाराजा ने पूछा । ‘अक्षयतृतीया के दिन ।’ ‘अच्छा दिन है ।’ ‘विदेशयात्रा सफल होगी ।’ ‘जल्दी जल्दी वापस आये …. अपन ऐसी ही कामना करें । ‘ अक्षयतुतीया का मंगल दिन आ पहुंचा…

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माँ का दिल – भाग 5

बेटी, पंचपरमेष्टि भगवंत सदा तेरा रक्षा करे … ऐसी शुभकभना करती रहूँगी… मैं तेरी राह देखूंगी … बेटी … तू भी कभी तेरी इस मां को याद करना ….’ रतिसुन्दरी की आंखों में आंसू की बाढ़ आ चुकी थी। राजा एवं रानी दोनों रथ में बैठकर अमरकुमार से मिलने के लिये धनावह श्रेष्ठि की हवेली पर आये । सेठ व…

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माँ का दिल – भाग 4

जब सुरसुन्दरी राजमहल में पहुँची, रानी रतिसुन्दरी ने उसे अपने अंक में भर लिया । वो फफक कर रो दी । सुरसुन्दरी भी रो पड़ी। सेठानी धनवती मां-बेटी को अकेला छोड़कर भारी मन से वापस लौट आयी । ‘बेटी , ‘रतिसुन्दरी का स्वर काँप रहा था ‘ , मैं तुझे ऐसा तो कहूँ भी कैसे कि तू परदेश मत जा…

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माँ का दिल – भाग 3

एक दिन ऐसा आ भी गया कि जिस की धनावह सेठ प्रतीक्षा कर रहे थे। धनवती ने खुद ही कहा : ‘जोशीजी के पास अच्छा मुहूर्त निकलवाया ?’ ‘किस के लिये?’ ‘अमर की विदोषयात्रा के लिये ही तो?’ ‘तो क्या तुमने इजाजत दे दी ?’ ‘हाँ , आज अमर ही आया था मेरे पास …. बे … चा …. रा…

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माँ का दिल – भाग 2

सेठ के चेहरे पर कुछ आभा छा गयी थी । धनवती गहरे सोच में डूबने लगी थी । ‘आपकी बात सही है , मेरा राग , मेरी आसक्ति ही मुझे दुःखी बना रही है। अमर का इस में क्या दोष है ? सुन्दरी भी क्या कर सकती है ? और आखिर सुन्दरी तो अमर के ही साथ रहे यह ज्यादा…

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