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जीवन जैसे कल्पवृक्ष – भाग 7

एक दिन धनावह सेठ की पेढ़ी पर सिंहलद्वीप के शाह सौदागर आ पहुंचे। वे अपने साथ लाखो रुपयों का माल लेकर आये थे। धनावह सेठ ने उनका स्वागत किया। अतिथिगृह में उन्हें स्थान दिया। और मुँह मांगी कीमत चुकाकर उनका माल खरीद लिया। व्यपारि भी खुश खुश हो उठे। उन्होंने भी धनावह सेठ से दूसरा लाखो रुपयों का माल खरीद…

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जीवन जैसे कल्पवृक्ष – भाग 6

दीये मद्धिम हुऐ जा रहे थे। अमरकुमार और सुरसुन्दरी-दोनों को क़रीब करीब समान शिक्षक मिला हुआ था। व्यवहारिक एवं धार्मिक दोनों तरह का शिक्षण उन्हें प्राप्त था। एक से वातावरण में दोनों का लालन -पालन हुआ था। संस्कार भी दोनों के समान थे। दोनों के विचारो में साम्य था। दोनो के आदेशो में कोई टकराव न था। दोंनो की जीवन…

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जीवन जैसे कल्पवृक्ष – भाग 5

अर्धचन्द्र की छिटकती चांदनी ने हवेली के इर्दगिर्द के वृक्षपरणो पर फैल फैल कर नृत्य करना प्रारंभ किया था। अमरकुमार सुरसुन्दरी को हवेली के उस झरोखे में ले गया जहाँ से कि बरसती चांदनी का अमृतपान किया जा सके! जहाँ बैठकर उपवन में से आ रही गीली गीली मादक रेशमी हवा का स्पर्श पाया जा सके ! दोनों की उभरती-उछलती…

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जीवन जैसे कल्पवृक्ष – भाग 4

सास एवं बहु! जैसे माँ और बेटी! स्नेह का सेतु रच गया। अपने सुख की कोई परवाह नही! माँ बहु के सुख को बढ़ाने का सोच रही है,,, बहु माँ को ज्यादा से ज्यादा सुख देने का सोच रही है। दोनों का प्रेम वही दोनो का सुख! पूजन,भोजन….. स्नेहमिलन…इत्यादि में ही दिन पूरा हो गया। कब सूरज पुरब से पश्चिम…

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जीवन जैसे कल्पवृक्ष – भाग 3

सुरसुन्दरी धनवती के पास जा पहुँची । धनवती के चरणों मे वंदना की….धनवती ने सुन्दरी को अपनी गोद मे खींच लिया । सुरसुरन्दरी को धनवती में रतिसुंदरी की प्रतिकृति दिखायी दी। धनवती के दिल में लहराते स्नेहसागर में वह अपने आप को डुबोने लगी। उसकी आँखों में वात्सल्यता के बादल मंडराने लगे। सुरसुरन्दरी टकटकी बांधे धनवती को देखने लगी….उसके बाहरी…

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