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चंदनबाला

चंपापुरी में दधिवाहन नामक एक राजा था। उसकी रानी पद्मावती थी, जिसका दूसरा नाम धारिणी था। उसके वसुमति नाम की एक पुत्री थी। 1 दिन कौशांबी के राजा शतानीक ने उस पर चढ़ाई की जिससे डरकर दधिवाहन राजा भाग गया। सैनिकों ने उसके नगर को लूटा और धारणी तथा वसुमति को उठाकर ले गए। अपने शील की रक्षा के लिए धारिणी मार्ग में ही अपनी जीभ काटकर मर गई। कौशांबी पहुंचने के बाद वसुमति को बाजार में बेचने के लिए खड़ा किया गया वहां एक सेठ ने उसे खरीद लिया। उस सेठ ने वसुमति का नाम चंदनबाला रखा। यह अति स्वरूप वती थी। इस कारण सेठ की पत्नी मूला को शंका हुई कि संभवत सेठ स्वयं इसके साथ विवाह करेंगे।

एक दिन सेठ जब बाहर गांव गया तब मुलाने चंदनबाला को एक तलघर में बंद कर दिया, उसके पैरों में बेड़ियां डाली और मस्तक मुंडवा दिया। इस प्रकार अन्न-जल रहित तीन दिन बीत गए। चौथे दिन सेठ को खबर हुई, तब तक घर खोल कर उसको बाहर निकाला और एक सुपे में उड़द के बाकले देकर उसकी बेड़ियां तुड़वाने के लिए लोहार को बुलाने गया। इधर चंदनबाला मन में विचार करती है कि मेरे तीन दिन का उपवास है, इसीलिए यदी कोई मुनिराज पधारें तो उनको बहोराकर फिर पारणा करूं। इतने में भगवान महावीर वहां पधारे, जिनको की 10 बोल का अभिग्रह था। इन अभिग्रह के बोलों में रुदन का एक बोल कम था यह देखकर वे पीछे फिरे। इसी समय चंदनबाला की आंखों में आंसू आ गए, यह देख भगवान पीछे फिरे और चंदनबाला के हाथ से पारणा किया। उस समय आकाश में देवदुंदुभी बजी, पंचदिव्य प्रगट हुए। चंदनबाला के मस्तक पर सुंदर बाल आ गए और लोहे की बेड़ियो के स्थान पर सुंदर दिव्य आभूषण हो गए। सर्वत्र चंदनबाला का जय जयकार हुआ। अंत में चंदनबाला ने भगवान महावीर से दीक्षा ली और साध्वी संघ में प्रधान बनी तथा क्रमशः केवली होकर मोक्षपद को प्राप्त हुई।

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