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अर्णिका-पुत्र आचार्य

उत्तर मथुरा में देवदत्त नामका एक वैश्य रहता था। वह धन कमाने के लिए दक्षिण मथुरा में आया और वहाँ अर्णिका के साथ उसके लग्न हुए। वहां से वापस उत्तर मथुरा में जाते समय अर्णिका ने मार्ग में पुत्रों को जन्म दिया और उसका नाम संधिरण रखा, परंतु जनता में वह अर्णिकापुत्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। योग्य आयु में जयसिंह आचार्य से दीक्षा ग्रहण कर क्रमानुसार वह आचार्य हुए। कुछ समय पश्चात पुष्पचूल राजा को रानी पुष्पचूलाने इनसे प्रतिबोध प्राप्त कर दीक्षा ली। एक समय दुष्काल पढ़ने से अन्य मुनिगण तो देशांतर चले गए, किंतु अर्णिकापुत्र आचार्य वृद्ध होने के कारण पुष्पचूल राजा के आग्रह से वहीं रहे। पुष्पचूला उनकी वैय्या वृत्य करती थी, ऐसा करते-करते उसको केवलज्ञान हुआ। इस बात का आचार्य को समाचार मिला, तब उन्होंने केवली पुष्पचूला से क्षमा मांगी और अपना मोक्ष कब होगा, यह प्रश्न पूछा? इसका उत्तर मिला की गंगा नदी पार उतरते समय तुम्हें मोक्ष प्राप्त होगा। थोड़े समय के बाद जब वे अन्य मनुष्यों के साथ नोका में बैठकर गंगा नदी पार कर रहे थे तब जिस और आचार्य थे उसी और से नोका भारी होने लगी। इससे लोगों ने उनको उठाकर नदी में फेंक दिया, परंतु समभाव में स्थिर रहने से उसी समय उनको केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। इन आचार्य का शरीर तैरता हुआ नदी के किनारे आ गया। उस स्थान पर कुछ समय के अनन्तर पाटल नामक पौधा लग गया कि जहां कालांतर में पाटलिपुत्र नामक सुंदर नगर बसा।

मृगावती
April 17, 2020
चंदनबाला
April 18, 2020

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